भारत में संवैधानिक गतिविधियों का विकास – परिचयात्मक अध्ययन

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जैसा कि हमने अपने पिछले ब्लॉग में पहले ही कहा था कि यह विषय आईएएस, पीसीएस और कई अन्य परीक्षाओं के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए भी एक महत्वपूर्ण विषय है, जिस पर हम यहां भी चर्चा करने जा रहे हैं। भारतीय राज्यव्यवस्था और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन। प्रत्येक प्रश्न पत्र में लगभग पच्चीस प्रतिशत प्रश्न भारतीय राजनीति, राज्यव्यवस्था और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के विषय पर आधारित होते हैं। तो इस श्रेणी में हम प्रत्येक विषय को विस्तार से समझेंगे और इसे आसान और समझने योग्य बनाने का प्रयास करेंगे। कृपया ब्लॉग के साथ बने रहें और टिप्पणी करते रहें।

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जैसा कि हमने अपने पहले के ब्लॉग में पहले ही उल्लेख किया है कि भारतीय राज्यव्यवस्था व राजतन्त्र प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने के लिए भारतीय भूगोल, भारतीय इतिहास, भारतीय अर्थशास्त्र जैसे सबसे महत्वपूर्ण विषयों में से एक है। जैसा कि पाठक जानते हैं कि हमने भारतीय इतिहास और भारतीय भूगोल पर ब्लॉग लिखना शुरू कर दिया है। भारतीय राज्यव्यवस्था की श्रेणी पर इस श्रृंखला में हमारे पहले ब्लॉग की निरंतरता में यह हमारा दूसरा ब्लॉग है। हम इसे आसान बनाने की कोशिश करेंगे, इसलिए ब्लॉग और समर्थन के लिए बने रहें।

भारत में संवैधानिक विकास

भारत में संवैधानिक विकास को समझने में आसान बनाने के लिए हम इस काल को चार चरणों में वर्गीकृत कर सकते है ।
01) वर्ष 1600 से 1757 तक का काल।
02) वर्ष 1758 से 1934 तक का काल।
03) वर्ष 1935 से 1947 तक का काल।
04) 15 अगस्त 1947 से 1952 तक का काल।

वर्ष 1600 से 1757 तक के काल में भारत में संवैधानिक विकास

इंग्लैंड के मूल निवासीयो ने एक कंपनी का गठन किया जिसका नाम ईस्ट इंडिया कंपनी रखा गया इस कंपनी का उद्देश्य पूर्वी भारत क्षेत्र में व्यापार करना था। वर्ष 1600 में ईस्ट इंडिया कंपनी व्यापारी के रूप में भारत में आए और इंग्लैंड की महारानी क्वीन एलिजाबेथ से एक घोषणापत्र (चार्टर ) भी हासिल करने में सफल हो गए, उस घोषणापत्र (चार्टर ) के अनुसार ईस्ट इंडिया कंपनी को पूर्वी भारत क्षेत्र में व्यापारिक अभियान आयोजित करने और भेजने के लिए अधिकृत घोषित किया गया था ।

घोषणापत्र (चार्टर ) में क्या लिखा था ?

घोषणापत्र (चार्टर ) जो इंग्लैंड की रानी की ओर से ईस्ट इंडिया कंपनी को दिया गया था, यह कहता है कि घोषणापत्र (चार्टर ) की वैधता शुरू में 15 साल की अवधि के लिए दी गई है और इस घोषणापत्र (चार्टर ) दो साल के नोटिस पर पहले भी समाप्त किया जा सकता है लेकिन यदि इंग्लैंड की रानी (क्राउन) और स्थानीय निवासियों के हित प्रभावित नहीं होते, तो प्रतिकूल रूप से, घोषणापत्र (चार्टर ) का नवीनीकरण किया जा सकता है।

घोषणापत्र (चार्टर ) प्राप्त करने के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा क्या किया गया ?

घोषणापत्र (चार्टर ) प्राप्त करने के बाद, ईस्ट इंडिया कंपनी ने कई स्थानों पर कारखाने या व्यापारिक केंद्र स्थापित किए और स्थानीय शासकों से भूमि और अन्य रियायतें भी प्राप्त कीं। कंपनी के बेहतर शासन के लिए, इसे कानून गठन, आदेश और अध्यादेश बनाने की शक्तियां भी दी गईं । ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1609 और 1661 में अतिरिक्त घोषणापत्र (चार्टर) के माध्यम से पट्टे का विस्तार का अधिकार भी प्राप्त कर लिया था।

इन सभी घटनाओं का परिणाम स्वरुप 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध (second half) तक, ईस्ट इंडिया कंपनी मुख्य रूप से एक व्यापारिक इकाई बन चुकी थी, और साथ ही साथ मुगल साम्राज्य के विघटन के बाद, देश में फैले अराजकता की परिस्थितियों का भी कंपनी ने पूरा फायदा उठाया और खुद को उपमहाद्वीप के बेजोड़ स्वामी के रूप में स्थापित कर लिया । 1757 में प्लासी की लड़ाई में कंपनी की जीत से भारत में ब्रिटिश शासन को भी मजबूत आधार मिला।

वर्ष 1758 से 1934 तक के काल में भारत में संवैधानिक विकास

जैसा कि हम पहले ही ऊपर उल्लेख कर चुके हैं कि भारत में अंग्रेजों का आगमन कैसे हुआ और कैसे यह 1757 तक अपनी जड़ें जमाने में सफल हो चुके थे। अब उनका तीसरा कदम था देश की क्षेत्रीय संप्रभुता की शुरुआत (beginning of the territorial sovereignty) करना था और उनका उद्देश्य जब पूरा हुआ जब उन्होंने 1765 में शाह आलम से बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी हासिल की और राजस्व एकत्र करने और नागरिक न्याय का प्रशासन करने का अधिकार प्राप्त कर लिया था। यही से कंपनी की क्षेत्रीय संप्रभुता की शुरुआत को चिह्नित किया जा सकता है।

यह सब देखते हुए ब्रिटिश क्राउन ने भी कंपनी के आचरण व व्यव्हार को विनियमित करने के लिए कई अधिनियम पारित किए। ब्रिटिश क्राउन द्वारा पारित किए गए कुछ उल्लेखनीय अधिनियमों में 1773 का विनियमन अधिनियम (the Regulating Act of 1773), 1781 का संशोधन अधिनियम (the Amending Act of 1781), 1784 का पिट्स इंडिया अधिनियम (Pitt’s India Act of 1784), 1786, 1793, 1813, 1833 और 1853 का अधिनियम शामिल हैं। लेकिन 1857 के विद्रोह (the Revolt of 1857) के बाद , भारत की संवैधानिक व्यवस्था में बड़ा परिवर्तन आया क्योंकि कंपनी अपनी शक्तियों को ब्रिटिश क्राउन को हस्तांतरित करने के लिए बाध्य हो गया, जिसके कारणवश ब्रिटिश क्राउन को भारतीय प्रशासन पर प्रत्यक्ष नियंत्रण प्राप्त हो गया।

1857 के विद्रोह (The Revolt of 1857)

मुझे लगता है कि यहां इस बिंदु को छूना महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत में संवैधानिक विकास के इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ है और यह स्वतंत्रता के पहले युद्ध के रूप में भी जानता है । आखिर 1857 का विद्रोह है क्या ? भारतीय पराधीनता के इतिहास में 1857 के विद्रोह का एक विशेष स्थान है, जिसे सिपाही विद्रोह या प्रथम स्वतंत्रता संग्राम भी कहा जाता है, 1857 में भारत में ब्रिटिश शासन के खिलाफ व्यापक लेकिन असफल विद्रोह की शुरुआत हुई। इस विद्रोह को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेवा में भारतीय सैनिकों (सिपाहियों) द्वारा मेरठ में शुरू किया गया, और यह विद्रोह दिल्ली, आगरा, कानपुर और लखनऊ में भी फैल गया था । 1857 के विद्रोह का मुख्य कारण क्या था ? 1857 के विद्रोह का मुख्य कारण एनफील्ड राइफल के लिए नए बारूद कारतूसों पर लगा ग्रीस था । हुआ यु की फरवरी 1857 में एनफील्ड राइफल के लिए नए बारूद कारतूसों की नई खेप जब मेरठ छावनी में पहुंची तो कारतूसों पर लगा ग्रीस के मुद्दे से बंगाल सेना की कई सिपाहियों की कंपनियों में एक विद्रोह छिड़ गया था उनका यह मानना ​​​​था कि कारतूस गाय और सुअर की चर्बी के साथ ग्रीस किए गए है और एनफील्ड राइफल को लोड करने के लिए अक्सर अपने दांतों से ग्रीस किए गए कारतूस को खोलने की आवश्यकता होती थी । 1857 का विद्रोह विफल क्यों हुआ ? 1857 के विद्रोह का मुख्य कारण इस प्रकार मान सकते है कि – 01) कमजोर नेतृत्व । 02) विद्रोह का योजनाबद्ध ना होना और विद्रोह के लिए संगठित न हो पाना। 03) 1857 के विद्रोह के दौरान विद्रोहियों में एकता का स्पष्ट अभाव हो पाना 04) सिपाहियों के बीच कोई सामान्य उद्देश्य का न होना। 05) विद्रोह का सीमित प्रभाव या विद्रोह का भारत के सभी भागों में न फैलना, बल्कि भारत के उत्तरी और मध्य भाग तक ही सीमित रहना।

अब हम वर्ष 1758 से 1934 तक के काल में भारत में संवैधानिक विकास की व्याख्या को आगे बढ़ाते है, 1858 के बाद जब ब्रिटिश ताज का भारत पर सीधा नियंत्रण हो गया था, और ब्रिटिश सरकार ने भारत के शासन को सुचारू रूप से चलाने के लिये कई अधिनियम बनाए, लेकिन इन पारित अधिनिवमो से अधिकांश भारतीयों की आकांक्षाओं को पूरा करने में विफल हो रहे थे और वे प्रशासन में भारतीयों की अधिक हिस्सेदारी के लिए आंदोलन करते रहे।

ब्रिटिश सरकार द्वारा किए गए कुछ महत्वपूर्ण अधिनियमों में भारतीय परिषद अधिनियम 1861, 1892 और 1909 (Indian Councils Acts at 1861, 1892 and 1909) और मोंटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार अधिनियम, 1919 (Montague Chelmsford Reform Act, 1919) शामिल हैं । इन अधिनियमों के माध्यम से ब्रिटिश सरकार द्वारा विभिन्न रियायतें भी दी गईं, लेकिन भारतीय समाज के लोग इन अधिनियमों से सदैव असंतुष्ट रहे।

वर्ष 1935 से 1947 तक के काल में भारत में संवैधानिक विकास

भारतीय नेतृत्व ने इस बात पर सदैव जोर दिया कि भारत का राजनीतिक भाग्य स्वयं भारतीयों द्वारा निर्धारित किया जाना चाहिए और 1935 में, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने मांग की कि भारत के स्थानीय लोगों को बाहरी हस्तक्षेप के बिना अपना संविधान बनाने का अधिकार होना चाहिए।

इसी आधार पर 1938 के कांग्रेस अधिवेशन में वयस्क मताधिकार के आधार पर निर्वाचित एक संविधान सभा की मांग ब्रिटिश सरकार के सामने रखी, लेकिन इस मांग को ब्रिटिश सरकार ने समर्थन देने से इंकार कर दिया और द्वितीय विश्व युद्ध के फैलने तक इसका विरोध करती रही। परन्तु ब्रिटिश सरकार व्यावहारिक बाधाओं से मजबूर होकर 1940 में पहली बार यह स्वीकार किया कि स्वायत्त भारत के लिए भारतीयों को स्वयं का अपना एक नया संविधान बनाना चाहिए और 1942 में युद्ध के दौरान युद्ध में भारतीयों के सहयोग को सुरक्षित करने के लिए, सर स्टैफोर्ड क्रिप्स (Sir Stafford Cripps) एक घोषणा पत्र के साथ भारत आए, और कहा कि यह घोषणा पत्र पर अमल ब्रिटिश सरकार द्वारा युद्ध के अंत में अपनाया जाएगा लेकिन यह प्रस्ताव भारत की दो प्रमुख पार्टियों – कांग्रेस और मुस्लिम लीग को स्वीकार्य नहीं था।

भारत में संवैधानिक उलझन को सुलझाने के लिए ब्रिटिश सरकारऔर भी प्रयास किए, जिनमे 1944 का सीआर फॉर्मूला (CR Formula) और 1945 का वेवेल प्लान (Wavell Plan) था, लेकिन ब्रिटिश सरकार के वे प्रयास व्यर्थ साबित हुए। इस संबंध में ब्रिटिश सरकार को कुछ सफलता 1946 के कैबिनेट मिशन योजना (Cabinet Mission Plan) के तहत हासिल हुई, इस कैबिनेट मिशन योजना (Cabinet Mission Plan) में देश के भविष्य के संविधान को तैयार करने के लिए एक संविधान सभा की स्थापना का सुझाव दिया गया था और यह भी प्रावधान रखा गया था कि जब तक संविधान तैयार नहीं हो जाता, तब तक केंद्र में मुख्य राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से युक्त एक अस्थायी सरकार स्थापित की जाएगी। इसी बीच जुलाई 1947 में, ब्रिटिश संसद ने भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, (Indian Independence Act)1947 पारित कर दिया, जिसके अनुसार 15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश सरकार से सत्ता को भारतीय हाथों में हस्तांतरण करने का प्रावधान था।

वर्ष 15 अगस्त 1947 से 1952 तक के काल में भारत में संवैधानिक विकास

ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम (Indian Independence Act)1947 में भारत को दो भागों में बाँटने की परिकल्पना की गई थी, भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम (Indian Independence Act)1947 के अंतर्गत भारत और पाकिस्तान दो अधिराज्यों की स्थापना करने की योजना थी। इस अधिनियम के अंतर्गत यह भी प्रावधान किया गया कि इन अधिराज्यों की विधायिकाओं को कोई भी कानून पारित करने का अधिकार होगा। 14-15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि को, संविधान सभा का एक विशेष सत्र सत्ता के औपचारिक हस्तांतरण को प्रभावी करने के लिए आयोजित किया गया था। भारतीय हाथों में सत्ता हस्तांतरण के बाद, संविधान सभा पर दो महत्वपूर्ण कार्य करने की जिम्मेवारी निभानी थी। 01) संविधान के निर्माण और कानून बनाने वाली संस्था का। 02) जब तक संसद के आम चुनाव नहीं हो जाते तब तक संसद की क्षमता में काम करना जारी रखना, भारत की पहली संसद के लिए आम चुनाव 1952 में होना संभव हो सका ।

दोस्तों, यह भारत में संवैधानिक विकास का मार्ग था। मुझे लगता है कि हर बिंदु को अच्छी तरह से समझाया गया है और अच्छा सीखने वाला मीटरियल है, इसलिए ब्लॉक से संपर्क करें और टिप्पणी करते रहें और आपके समर्थन के लिए धन्यवाद।

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