भारत का प्राकृतिक भूगोल – उत्तर की पर्वत श्रंख्लाए – एक अध्ययन

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जैसा कि इतिहास ने प्रमाणित किया है कि भारत की संस्कृति एक अनूठी संस्कृति है और दुनिया की सबसे पुरानी और महान सभ्यताओं में से एक है। इस ब्लॉग में, हम भारत के भौतिक परिस्थितयों पर एक विस्तृत चर्चा करने जा रहे हैं, जिसे एक पुन-परीक्षण सामग्री के रूप में भी बनाया जा सकता है और विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में सहायक हो सकता है, इसलिए ब्लॉग पर बने रहें

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इस ब्लॉग में, हम भारत की प्राकृतिक भूगोल के बारे में चर्चा कर रहे हैं जो यूपीएससी-प्रारंभिक, एसएससी, राज्य सेवाओं, एनडीए, सीडीएस, रेलवे और कई अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए बहुत उपयोगी है।
हम इसे एक पुनरीक्षण नोट्स के रूप में बनाने की कोशिश कर रहे हैं, इसलिए ब्लॉग के साथ बने रहें।

भारत की भौगोलिक स्थिति में विविधता के कारण भारत को चार इकाइयों में विभाजित किया जा सकता है- 01) उत्तर में पर्वत श्रंख्लाए, 02) उत्तरी भारत के मैदान क्षेत्र और तटीय इलाका, 03) दक्षिण का पठारी क्षेत्र। 04) भारत के द्वीप समूह

उत्तर में पर्वत श्रंख्लाए – हिमालय

ऐसा माना जाता है कि हिमालय पर्वत श्रंख्लाए दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है और इसकी उत्पत्ति का मुख्य कारण तलछटी चट्टानें (sedimentary rocks) को एकजुट होना है अथवा इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि इसमें मुख्य रूप से तलछटी चट्टानें (sedimentary rocks) शामिल हैं।

हिमालय पर्वत श्रृंखलाओं की विशेषताए

01) हिमालय पर्वत श्रंख्लाए भारत की उत्तरी सीमा को भी चिन्नित करता है, 02) हिमालय पर्वत श्रंख्लाए पश्चिम में जम्मू और कश्मीर से लेकर पूर्व में असम, मणिपुर और मिजोरम तक फैली हुई है। 03) इन श्रृंखलाओं की कुल लंबाई लगभग 5,000 किमी है जिसमें से लगभग 2,500 किमी सीमा के साथ-साथ एक चाप (an arc) के आकार में फैली हुई है। 04) हिमालय के पहाड़ों की चौड़ाई लगभग 150 से 400 किमी के बीच अनुमानित की जाती है । 05) हिमालय पर्वत की औसत ऊंचाई लगभग 2,000 मीटर आंकी जाती है। 06) हिमालय पर्वत श्रृंखलाओं की ऊंचाई कमोबेश पूर्व दिशा की ओर घटती जाती है।

हिमालय पर्वत श्रृंखलाओं की उत्पत्ति का स्रोत

ऐसा माना जाता है कि हिमालय पर्वत श्रंख्लाए तृतीयक युग ( tertiary era) के दौरान उस क्षेत्र में बना था जिसे पहले टेथिस सागर (Tethys sea) कहा जाता था जो दक्षिण में गोंडवानालैंड और उत्तर में अंगारालैंड के बीच स्थित था। यहाँ शायद मेरे पाठको के मन में यह प्रश्न आ सकता है कि तृतीयक युग का अर्थ क्या है ? तृतीयक युग शब्द का प्रयोग भूगर्भिक काल के उस युग के लिए किया जाता है जो लगभग 66 मिलियन से 2.6 मिलियन वर्ष पूर्व का युग था। गोंडवानालैंड क्या है? कक्षा 9 के पाठ्यक्रम में गोंडवानालैंड पर एक पाठ है या वहाँ परिभाषा इस तरह दी गई है कि गोंडवानालैंड जिसे गोंडवाना भी कहा जाता है। प्राचीन काल में एक विशाल महाद्वीपीय क्षेत्र (supercontinent) था जिसमें वर्तमान दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका, अरब, मेडागास्कर, भारत, ऑस्ट्रेलिया और अंटार्कटिका शामिल थे। ऐसा माना जाता है कि यह विशाल महाद्वीपीय क्षेत्र दक्षिणी गोलार्ध में मौजूद था और मेसोज़ोइक काल में पैंजिया (Pangaea in Mesozoic times) के टूटने के परिणामस्वरूप हुआ होगा।

यदि हम तृतीयक युग ( tertiary era) के दृष्टिकोण को आधार माने तो उनके अनुसार, – भू-भाग के दो विशाल खंड आपस में टकरा गए होंगे – और टेथिस सागर (Tethys sea) में उपस्थिय तलछट (sediments) के संकुचित होने के कारण हिमालय पर्वत श्रृंखलाओं का निर्माण हुआ होगा। लेकिन यदि हम प्लेट टेक्टोनिक्स के सिद्धांत को आधार माने तो उनके अनुसार, – भारतीय प्लेट या गोंडवानालैंड उत्तर की ओर चला गया होगा – जिस कारण इसका आगे का किनारा तिब्बती प्लेट के दक्षिणी किनारे के नीचे प्रवेश कर गया होगा। – इसी के परिणामस्वरूप हिमालय का तह (foldings) और उत्थान हुआ होगा – इस बात के प्रमाण हैं कि भारतीय प्लेटें अभी भी उत्तर दिशा की ओर एक अगोचर स्थान पर चल रही हैं जो हिमालयी क्षेत्र में लगातार भूकंप के लिए जिम्मेदार है।

हिमालय पर्वत श्रृंखलाओं का स्वरूप

– हिमालय पर्वत श्रृंखलाओं में लगभग समानांतर पर्वतमालाएं शामिल हैं। – इसी श्रेणी की सबसे पश्चिमी और पूर्वी सीमाएँ क्रमशः सिंधु घाटी और ब्रह्मपुत्र घाटी के द्वारा बनाई गई हैं। – दी ग्रेट हिमालय या इनर हिमालय या सेंट्रल हिमालय, जिसे हिमाद्री के नाम से भी जाना जाता है यह उत्तरी रेंज का सबसे ऊंचा इलाका भी है। – यहाँ उत्तरी रेंज में हिमालय पर्वत लगभग 25 किमी चौड़ा है और यहाँ कई नदियों का स्रोत क्षेत्र भी है – उत्तरी रेंज में हिमालय पर्वत के पहाड़ों की औसत ऊंचाई लगभग 6,000 मीटर तक पहुंच जाती हैं।

दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी

माउंट एवरेस्ट (Mount Everest) दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी हैं। माउंट एवरेस्ट को सागरमाथा के नाम से भी जाना जाता है । माउंट एवरेस्ट पर्वत की ऊंचाई लगभग 8.848 मीटर की है । इस श्रेणी की अन्य महत्वपूर्ण चोटियाँ इस प्रकार हैं – कंचनजंघा 8.598 मीटर, मकालू 8,481 मीटर और धौलागिरी 8172 मीटर। इस श्रेणी की अधिकांश चट्टानें कायांतरित  चट्टानें (metamorphic rock) हैं।

मध्य हिमालय का दक्षिणी भाग

मध्य हिमालय के दक्षिण भाग जिसे लघु हिमालय या हिमाचल या मध्य हिमालय भी कहा जाता है। यहां के पहाड़ों की औसत ऊंचाई लगभग 1800 मीटर की है और चौड़ाई 80 से 100 किमी के बीच की है। अधिकांश पर्यवेक्षकों के अनुसार, इस क्षेत्र की यह पर्वत श्रंख्लाए बहुत धीमी गति से ऊपर उठ रही है और हिमालयी नदियों ने इस खंड को गहरी घाटियों में काट दिया है।

शिवालिक पर्वत श्रंख्लाए

– शिवालिक पर्वत श्रंख्ला को उप-हिमालय पर्वत श्रृंखलाओं के नाम से भी जाना जाता है । – इस पर्वत श्रंख्ला को बाहरी हिमालय के नाम से भी जाना जाता है। – इस पर्वत श्रंख्ला का निर्माण हाल ही में हुआ है और इस क्षेत्र को हिमालय की नवीनतम पर्वत श्रंख्ला भी कहा जाता है। – इस श्रंख्ला के पर्वतों की श्रेणी तीसरी और सबसे निचली पर्वत श्रृंखलाओं श्रेणी में आती हैं । – इस पर्वत श्रंख्ला की लंबाई लगभग 2400 किमी है जो की पश्चिम में पोटवार बेसिन और पूर्व में तीस्ता नदी के बीच की है। – यह पर्वत श्रंख्ला मैदानी इलाकों को जलोढ़ (alluvium) से भरे घाटियों से अलग करती है जिन्हें डेंस और डुअर्स (dens and duars) भी कहा जाता है। – इस पर्वत श्रंख्ला क्षेत्र की चट्टानें हिमालय की नदियों और हिमनदों द्वारा जमा किए गए मलबे से प्राप्त हुई हैं। – शिवालिक पर्वत श्रेणी केवल हिमालय के पश्चिमी भाग में ही फैली हुई है और ऐसा माना जाता है कि पूर्वी भाग में इस श्रेणी का जलोढ़ (alluvium) के अधिक जमाव के कारण इसका क्षरण हो गया है। इसके कारण ही भारत के पूर्वी भाग के मैदानों से ऊँची पर्वत श्रृंखलाएँ एकाएक उठती हुई प्रतीत होती हैं।

उत्तर का ट्रांस-हिमालय

– महान हिमालय के उत्तरी भाग को ट्रांस-हिमालय या तिब्बत हिमालय भी कहा जाता है। – यह पर्वत श्रेणी उत्तर दिशा की ओर बहने वाली और दक्षिण दिशा की ओर बहने वाली नदियों के बीच का जलसंभर (watershed) का कार्य करती है। – हिमालय पर्वत श्रृंखलाओं की प्रणाली में कुछ छोटी पर्वत श्रेणियां भी हैं। इनमें काराकोरम (सबसे ऊंची चोटी-के 2) और पश्चिम में जास्कर पर्वतमाला, और पूर्व में पथकाई, लुशाई और गारो पर्वतमाला शामिल हैं। – ब्रह्मपुत्र घाटी के पूर्व में पहाड़ी क्षेत्र को अक्सर पूर्वाचल कहा जाता है।

हिमालय घाटी का क्षेत्रीय विभाजन

हिमालय को अक्सर क्षेत्रीय आधार पर भी विभाजित किया जाता है। – हिमालय पर्वत श्रंख्ला का यह भाग जो सिंधु और सतलुज नदियों के बीच 562 किमी तक फैला हुआ है उस हिमालय पर्वत श्रंख्ला के भाग को पंजाब हिमालय कहा जाता है । – हिमालय पर्वत श्रंख्ला का यह भाग जो सिंधु नदी और काली नदी के बीच 320 किमी तक फैला हुआ है उस हिमालय पर्वत श्रंख्ला के भाग को कुमाऊं हिमालय कहा जाता है । – हिमालय पर्वत श्रंख्ला का यह भाग जो काली नदी और तीस्ता नदी के बीच 800 किमी तक फैला हुआ है उस हिमालय पर्वत श्रंख्ला के भाग को नेपाल हिमालय कहा जाता है । हिमालय की सबसे ऊँची चोटियाँ भी इसी क्षेत्र में स्थित हैं। – और अंत में, हिमालय पर्वत श्रंख्ला का यह भाग जो तीस्ता नदी और ब्रह्मपुत्र नदी के बीच 750 किमी तक फैला हुआ है उस हिमालय पर्वत श्रंख्ला के भाग को असम हिमालय कहा जाता है ।

अन्य विशेषताएँ

हिमालय पर्वत श्रंख्ला न केवल विश्व की सबसे ऊँची छोटी होने का गौरव रखता है बल्कि यह पर्वत श्रंख्ला बड़ी संख्या में नदियों का स्रोत होने का गौरव भी रखता है इतना ही नहीं, हिमालय पर्वत श्रंख्ला कई हिमनदों (glaciers) का घर भी है। यह क्षेत्र ध्रुवीय क्षेत्रों के बाहर सबसे बड़ा हिम क्षेत्र है।

प्रिय पाठकों, भारत का प्राकृतिक भूगोल विषय यहीं समाप्त नहीं होता है, तीन बिंदुओं पर चर्चा अभी बाकी है। वो हैं –
01) उत्तरी भारत के मैदान क्षेत्र और तटीय इलाका,
02) दक्षिण का पठारी क्षेत्र, 03) भारत के द्वीप समूह
अगर हम इन बिंदुओं पर यहां चर्चा करते हैं तो यह ब्लॉग इतना लंबा हो जाता है याद रखना मुश्किल हो जाएगा इसलिए हम इन बिंदुओं पर अगले आने वाले अलग ब्लॉग में चर्चा करेंगे। कृपया ब्लॉग से जुड़े रहें।
धन्यवाद

भारत के मैदानी क्षेत्र और पठारी क्षेत्र की जानकारी के यहां क्लिक करे

भारत के दक्षिण का पठारी क्षेत्र की जानकारी के यहां क्लिक करे

भारत के द्वीप समूह की जानकारी के यहां क्लिक करे

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