भारत का प्रागैतिहासिक काल – विवरण में अध्ययन

Table of Contents

अपने पूर्वजों के अतीत की गहराई में उतरना एक कठिन काम है या ऐसा कह सकते हैं कि हमारे पूर्वजों के अतीत को समझना असंभव है। इस काल को “प्रागैतिहासिक” काल के के नाम से जाना जाता है यह काल लेखन और सभ्यताओं से पहले का युग हो सकता है इसलिए इस युग को पाषाण युग कहा जाता है इस एक लंबी अवधि के युग को तीन चरणों में विभाजित किया जा सकता है पुरापाषाण युग, मध्य युग, नवपाषाण युग। यह विषय भारतीय इतिहास में बहुत महत्वपूर्ण है हम इस ब्लॉग में इस विषय पर विस्तार से चर्चा करेंगे। इसलिए ब्लॉग से जुड़े रहें

created by www.saarkarinaukri.com
https://www.saarkarinaukri.com/

इतिहास के अध्ययन का अर्थ है अतीत का अध्ययन। हम इतिहास को प्रमुख भागों में विभाजित कर सकते हैं।
01) प्रागैतिहासिक काल (Prehistorical period)
02) अभिलेखित इतिहास काल (Recorded history period)

प्रागैतिहासिक काल की परिभाषा क्या है

प्रागैतिहासिक काल उस काल को माना जाता है जब मानव गतिविधि का कोई रिकॉर्ड नहीं मिलता है या यह भी कहा जा सकता है कि एक रिकॉर्ड करने योग्य इतिहास से पहले मानव जीवन कैसा था। यह इतिहास काल केवल अपवादों पर आधारित है। प्रागैतिहासिक काल लगभग 2.5 मिलियन वर्ष पूर्व से 1,200 ईसा पूर्व तक का माना जाता है।

अभिलेखित इतिहास काल की परिभाषा क्या है?

अभिलेखित इतिहास एक लिखित इतिहास है जो एक लिखित रिकॉर्ड या अन्य प्रमाणित दस्तावेज के आधार पर ऐतिहासिक कथा प्रदान करता है। यह अतीत के अन्य आख्यानों के विपरीत है, जैसे कि पौराणिक कथाएं, मौखिक कहानी और पुरातत्व परंपराएं ।

अभिलेखित इतिहास किस तिथि से प्राप्त होता है?

अभिलेखित इतिहास की अवधि लगभग 5,000 वर्ष की मानी जाती है, जो सुमेरियन क्यूनिफॉर्म लिपि से शुरू होती है, जिसमें लगभग 2600 ईसा पूर्व के सबसे पुराने सुसंगत ग्रंथ शामिल हैं।

लिखित इतिहास का सबसे पुराना सूचना स्रोत क्या है?

सुमेरियन पुरातन क्यूनिफॉर्म लिपि और मिस्र के चित्रलिपि को आम तौर पर सबसे प्रारंभिक लेखन प्रणाली माना जाता है, दोनों प्रणालियाँ अपने पैतृक प्रोटो-साक्षर प्रतीक (ancestral proto-literate symbol systems) से 3400-3200 ईसा पूर्व से उभर रहे थे, जो की लगभग 2600 ईसा पूर्व के सबसे सुसंगत ग्रंथों में एक हैं।

प्रागैतिहासिक काल (Prehistorical period)

अब हम प्रागैतिहासिक काल की परिभाषा को पहले ही समझ चुके हैं। प्रागैतिहासिक काल कल्पनाओं से भरा है और सटीक व्याख्या करना आसान काम नहीं है और इस अवधि को समझना भी बच्चों का खेल नहीं है, लेकिन प्रतियोगिता के दृष्टिकोण से समझना बहुत महत्वपूर्ण है।
इस अवधि को समझने में आसान बनाने के लिए इस अवधि को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है हम नीचे एक-एक करके चर्चा करेंगे –
01) पुरापाषाण काल ​​या पुरानापाषाण युग (Palaeolithic Period or Old Stone Age) 02) मध्य पाषाण काल ​​या उत्तर पाषाण काल (Mesolithic Period or the Late Stone Age)
03) नवपाषाण युग ​​या नवपाषाण काल (Neolithic Period or New Stone Age) 04) ताम्रपाषाण युग (Chalcolithic Settlements Period)

पुरापाषाण काल ​​या पुरानापाषाण युग (Palaeolithic Period or Old Stone Age)

यदि हम 4,00,000 से 2,00,000 ईसा पूर्व के बीच के दूसरे अंतर हिमनद काल में वापस जाते हैं, तो भारत में अब तक खोजे गए मानव अस्तित्व के सबसे पुराने निशान पाए जाते हैं। यह सोन घाटी ( जो अब पाकिस्तान में चला गया है) और दक्षिण भारत में मुख्य रूप से चेन्नई और उसके आसपास पाए जाने वाले बड़ी संख्या में आदिम पत्थर के औजारों से सुनिश्चित होता है। जिससे यह ज्ञात होता है की पुरापाषाण (पुराने पाषाण) युग जो 8,000 ईसा पूर्व तक चला, में आदिम मानव कच्चे पत्थरों के औजार और औजारों का इस्तेमाल किया करते थे। आदिम मानव आमतौर पर चकमक पत्थर का इस्तेमाल किया करते थे क्योंकि यह पत्थर अधिक कठोर होता है लेकिन यह आसानी से ढाला जा सकता है। उनके यह औजार उनके विभिन्न उद्देश्यों की पूर्ति करने में सहायक थे, उदाहरण के लिए मृत पशु की खाल को उतारना, मृत पशु के मांस और उनकी हड्डियों को काटना आदि। इस अवधि के दौरान के मनुष्य अनिवार्य रूप से खाद्य संग्राहक थे।

इस अवधि के दौरान के मनुष्य अपनी खाद्य आपूर्ति की आवश्यकता के लिए लगभग पूरी तरह से प्रकृति पर निर्भर थे, फिर चाहे वह खाने योग्य पौधे की उपलब्धता हो या पशु के मांस की। इस युग के मनुष्यों ने समय के साथ आग जलाना और आग को नियंत्रित करना सीख लिया था जिसके कारण कई तरह से जीवन जीने के तरीके में सुधार हुआ। इस अवधि के दौरान के मनुष्य जानवरों की खाल, पेड़ों की छाल और बड़े पत्तों को कपड़े के रूप में इस्तेमाल करने लगे थे।

धीरे-धीरे उस काल के मनुष्यों ने स्वयं को छोटे-छोटे घूमने वाले समूहों में संगठित किया जिनमें कुछ पुरुष, महिलाएं और बच्चे शामिल थे। यह पुरापाषाण काल ​​​​के अंत का समय था और आधुनिक मानव होमोसैपियन्स (homosapiens) पहली बार लगभग 36,000 ईसा पूर्व प्रकट हुआ था।

होमोसैपियंस का अर्थ क्या है?

होमोसेपियन का अर्थ है आधुनिक मानव। होमेपियनिसा शब्द दो लेटिन शब्दों होमो और सेपियन्स का संयोजन है, ‘होमो’ लैटिन एक शब्द है जिसका अर्थ है ‘मानव’ या ‘आदमी’ और सेपियन्स भी एक लैटिन शब्द से लिया गया है जिसका अर्थ है ‘बुद्धिमान’ या ‘अचरज’.

मध्य पाषाण काल ​​या उत्तर पाषाण काल (Mesolithic Period or the Late Stone Age)

मध्य पाषाण युग 8,000 ईसा पूर्व से शुरू हुआ, इस युग को हिम युग का अंत भी माना जाता है जिसे मध्य पाषाण युग भी कहा जाता है, प्राचीन सांस्कृतिक चरण जो पुरापाषाण (पुराना पाषाण युग) के बीच मौजूद था, पाषाण युग की संस्कृति में एक मध्यवर्ती चरण शुरू हुआ। इसे उत्तर पाषाण युग भी कहा जाता है। अगर हम भारत की बात करें तो ऐसा माना जाता है कि भारत में, यह लगभग 4,000 ईसा पूर्व तक अच्छी तरह से उत्तर पाषाण युग जारी रहा।

इस बदलाव के चरण को उस युग के विशिष्ट उपकरण से पहचाना जा सकता है क्योंकि इस युग के विशिष्ट उपकरण/औज़ारो में सूक्ष्म पाषाण (माइक्रोलिथ) की झलक मिलती हैं, उदाहरण के लिए उपकरण/औज़ारो का विशेष नुकीलापन या धारदार किनारे वाले उपकरण या उपकरण/औज़ारो में अर्धचंद्राकार आकृति के ब्लेड, भाला आदि। इनमें से कुछ का उपयोग तेज गति से चलने वाले जानवरों को मारने के लिए प्रयोग किया जाता था। मध्य भारत में छोटानागपुर पठार और कृष्णा नदी के दक्षिण में विभिन्न मेसोलिथिक स्थल पाए जाते हैं। यह चरण एक विशिष्ट और तेजी से कुशल खाद्य संग्रह की परवर्ती को दर्शाता है, इस चरण में पौधों की खेती (plant cultivation) की शुरुआत होती है।

यहाँ यह समझाना चाहते हैं कि माइक्रोलिथ क्या है ?

माइक्रोलिथ एक छोटा पत्थर का उपकरण है जो आमतौर पर त्रिकोणीय, वर्गाकार या ट्रेपोजॉइडल के आकार में चकमक पत्थर से बना होता है,

नवपाषाण युग ​​या नवपाषाण काल (Neolithic Period or New Stone Age)

नवपाषाण युग वह काल था जब खाद्य उत्पादन की अवस्था शुरू हो चुकी थी। इस प्रक्रिया ने मानव जीवन को पूरी तरह से बदल दिया था या ऐसा भी कहा जा सकता है कि मनुष्य ने अपने जीवन के तरीके को बदल दिया था। यदि हम विश्व इतिहास के संदर्भ में बात करे तो नवपाषाणकालीन गतिविधियां की शुरुआत 7,000 ईसा पूर्व के आसपास हो चुकी थी , लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप में नवपाषाणकालीन गतिविधियां की शुरुआत का इतिहास ​​​​4,000 ईसा पूर्व से अधिक पुराने नहीं हैं। अब नवपाषाणकालीन गतिविधियां के निशान ज्यादातर भारत के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र और दक्कन क्षेत्र में बचे ही हैं। बलूचिस्तान में नियोलिथिक काल की गतिविधियों की लगभग 3,500 ईसा पूर्व की सबसे पुरानी डेटिंग मिली थी।

जीवन के इस नए तरीके में, मनुष्यों ने जानवरों को पालतू बनाना और पौधों की खेती करना सीख लिया था। यदि जानवरों को पालतू बनाने की प्रवृत्ति के बारे में बात की जाए तो कुत्ता, बकरी और भेड़ शायद पहले थे। अगर हम फसल उगाने की प्रवृत्ति के बारे में बात करते हैं तो गेहूं और जौ सबसे पहले उगाए जाने वाले अनाज थे। परिणामस्वरूप, मनुष्य कुछ चुनिंदा क्षेत्रों में बसने लगा, जहाँ वे आसानी से अपने पालतू मवेशियों को खिलाने के लिए अच्छे मैदान उपलब्ध थे और जहाँ उन्हें अधिक फसल उगाने के लिए उपजाऊ भूमि मिलती थी। इससे गांवों और कृषक समुदायों का विकास हुआ।

नवपाषाण काल ​​के मनुष्यों ने अपने औजारों को अपनी जरूरतों के हिसाब से बदल लिए थे जैसे जमीन खोदने व पहाड़ो/पत्थर को काटने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली एक भारी खुदाई-छड़ी, कटाई के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला दरांती, पेड़ों को काटने के लिए कुल्हाड़ी, अधिशेष अनाज को संरक्षित करने के लिए सुरक्षित स्थान और तरल पदार्थ रखने के लिए विभिन्न प्रकार के मिट्टी के बर्तनों, अनाज को पीसने के लिए एक पीसने का पत्थर आदि। इस काल के लोग ज्यादातर गेरू रंग का प्रयोग करते थे , मिट्टी के बर्तन और पहिए का आविष्कार इस योग की एक महत्वपूर्ण खोज थी।

ताम्रपाषाण युग (Chalcolithic Settlements Period)

नवपाषाण काल ​​के अंत होते – होते इस युग के मानव ने धातुओं का उपयोग करना सीख लिया था शुरू हुआ। इसलिए इस योग को ताम्रपाषाण युग (Chalcolithic Settlements Period) के नाम से जाना जाता है । ताम्रपाषाण काल ​​(1.800-1,000 ईसा पूर्व) से शुरू हुआ था। इस ताम्रपाषाण काल ​​में जब तांबे या कांसे और पत्थर के औजारों का उपयोग किया जाने लगा था और पुरुष एक व्यवस्थित जीवन व्यतीत करने लगे थे। ऐसा माना जाता है कि छोटानागपुर पठार से ऊपरी गंगा बेसिन तक फैले एक विस्तृत क्षेत्र में ताम्रपाषाण संस्कृतियां मौजूद थीं। कुछ ताम्रपाषाण स्थल ब्रह्मगिरी (मैसूर के पास) और नवादा टोली (नर्मदा पर) में भी पाए जाते हैं। लेकिन भारत में कांस्य उपकरण लगभग अनुपस्थित थे, जबकि उसी ने क्रेते, मिस्र और मेसोपोटा में शुरुआती सभ्यताओं के उदय की सुविधा प्रदान की।

हालांकि देश के बड़े हिस्से में मौजूद अधिकांश पाषाण-तांबा युग की संस्कृतियां हड़प्पा संस्कृति से छोटी थीं, लेकिन हड़प्पावासियों को अपनी उन्नत जानकारी से कोई खास लाभ नहीं मिला।

हम हड़प्पा सभ्यता के बारे में एक अलग ब्लॉग में विस्तार से चर्चा करेंगे ताकि ब्लॉग के साथ संपर्क में रहें।
ब्लॉग पढ़ने के लिए धन्यवाद। कृपया प्रेरणा के लिए और लेखन कौशल में और सुधार के लिए टिप्पणी करते रहें

भारत का इतिहास का महत्त्व समझने में आसान – एक प्रयास ब्लॉग पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *